गुस्से के बारे इस्लामी तालीमात
गुस्सा फितरते इंन्सानी है, लेकिन अगर उस पर क़ाबू न पाया जाये ताे उस के भयानक असरात सामने आ सकते है, मियां, बीवी मे जुदाई, आैलाद व वालिदैन मे दूरी,भाईयाें मे इख्तिलाफ, मुआशरे मे बिगाड, दुनया मे ज़ुल्म व बरबरियत आैर फित्ने, फसाद की जड, गुस्सा है, जब तक गुस्सा दबा हाेता है, तब तक फितना दबा हाेता है, आैर जब गुस्सा बेक़ाबू हाे जाता है ताे फितना,फसाद भी अपना मुंह खाेल देता है, अयसे माेक़े से शैतान काफी फायदा उठाता है, वह दाे फरीक़ (जमात) मे नफरत व इंतिक़ाम (बदला) की आग भडकाता है, आैर इंन्सान बिला दरेग़ एक दूसरे का खून कर बैठता है, गुस्से के बुरे असरात, इंन्सानी जिस्म आैर रूह पर भी पडते है, रगें फूल जाना, चेहरा लाल हाे जाना, सांसाें मे तैजी पैदा हाेना, गुस्सा हाेने की अलामत है, गुस्से की वजह से पेट मे मअ्दे की शिकायत, काेलिस्टराेल की ज़्यादती, आतडियाें की परेशानी, क़ुव्वते मुदाफअत (प्रतिकार शक्ती) की कमी,ब्लडप्रेशर, फालिज (लक़्वा) का खतरा, आैर दिल की बीमारियां पैदा हाेती है,इसी तरह सर, दिमाग, याद दाश्त,वगैरह मे कमजाे़री पैदा हाे जाती है,बल्के ज्यादा गुस्से से माैत का रास्ता भी हमवार हाे सकत...