* मुसलमान लोग यह गुमान क्यों करते हैं कि उन्हीं का धर्म सच्चा है ?
* आख़िर मुस्लिम लोग अपने धर्म इस्लाम के बारे में इतना गुमाँ क्यूँ करते है कि,
* उनका ही धर्म सच्चा है ?
* क्या दुनियाँ के बाकी धर्म झूठे है?? ** कुछ इसी तरह के सवाल नॉन-मुस्लिम के मन में आते रहते हैं ! * और जो आदमी इस धर्म को व्यवहार में ला चुका है, इसके अंदर जो चीज़ें हैं उन पर उसका विश्वास और आस्था है , * और वह उस के अनुसार कार्य कर रहा है, तो उसे पूर्णतया उस नेमत की मात्रा का पता है जिस में वह जीवन यापन कर रहा है और वह इस धर्म की छत्र छाया में रह रहा है, वह इसका क्या जवाब दे ! तो आईये जाने कि इस सवाल का क्या जवाब है : 1. मुसलमानकेवल एक मा’बूद (पूज्य) की उपासना करता है , * जिसका कोई साझीदार नहीं, जिसके सुंदर नाम और उच्चतम गुण हैं। * चुनाँचि मुसलमान की दिशा और उसका उद्देश्य एक होता है, * वह अपने पालनहार और सृष्टिकर्ता पर विश्वास रखता और उसी पर भरोसा करता है, और उसी से मदद, सहायता और समर्थन मांगता है, * वह इस बात पर विश्वास रखता है कि उस का पालनहार हर चीज़ पर सक्षम और शक्तिवान है, * उसे बीवी और बच्चे की आवश्यकता नहीं है, * उसने आसमानों और धरती को पैदा किया, * वही मारने वाला, * जिलाने वाला, * पैदा करने वाला, * और रोज़ी देने वाला है। * अत: मुसलमान बन्दा उसी से रोज़ी मांगता है। * वह अल्लाह सुनने वाला क़बूल करने वाला है, * अत: बन्दा उसीको पुकारता , * (दुआ करता) और क़बूलियत की आशा रखता है। * वह अल्लाह तौबा स्वीकार करने वाला, क्षमा करने वाला दयावान् है, * अत: बन्दा जब पाप करता है, * और अपने रब की इबादत में कोताही करता है, * तो उसी के सामने तौबा करता है। * वह अल्लाह सर्वज्ञानी, * सब चीज़ों की सूचना रखने वाला, * और देखने वाला है, * जो कि दिल की इच्छाओं, भेदों और सीने की बातों को भी जानता है, * अत: बन्दा गुनाह के पास जाने से शर्म करता है और अपने नफ्स पर या किसी दूसरे पर ज़ुल्म नहीं करता है, * क्योंकि वह जानता है कि उसका पालनहार उस से अवगत है. * और उसे देख रहा है। * वह जानता है कि उस का * रब हकीम (तत्वदर्शी) है, * ग़ैब (प्रोक्ष) की बातों का जानने वाला है, * अत: जो कुछ अल्लाह ने उसके लिए चयन किया है, * और उस के बारे में मुक़द्दर किया है, * उस पर विश्वास और भरोसा करता है, * और इस बात को मानता है कि उसके रब ने उस पर ज़ुल्म नहीं किया है, * औरउस ने उसके लिए जो भी फैसला किया है वह उसके लिए बेहतर है, * अगरचे बन्दे को उसकी हिकमत (तत्वदर्शिता) का ज्ञान न हो।
2. मुसलमान की आत्मा पर इस्लामी उपासनाओं के प्रभाव :
* नमाज़ बन्दा और उसके पालनहार के बीच संपर्क का एक साधन है, * जब वह विनम्रता के साथनमाज़में प्रवेश करता है, * तो सुकून (शान्ति), इत्मेनान (संतुष्टि) और आराम का अनुभव करता है, * क्योंकि वह एक मज़बूत स्तंभ का शरण लेता है , * और वह अल्लाह अज्ज़ा व जल्ल है, इसीलिए इस्लाम के, * पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कहा करते थे : * हमें नमाज़ के द्वारा राहत पहुँचाओ, * और जब आप को कोई मामला पेश आता था तो आप नमाज़ की तरफ भागते थे। * हर वह आदमी जो किसी मुसीबत में पड़ गया और नमाज़ को आज़माया तो उसे जो मुसीबत पहुँची है उस से ढारस (सांत्वना) और धैर्य की सहायता का अनुभव हुआ है। * इस का कारण यह है कि वह नमाज़ में अपने रब के कलाम (वाणी) को पढ़ता है , * और रब के कलाम (वाणी) के प्रभाव की तुलना किसी मनुष्य के कलाम के प्रभाव से नहीं की जा सकती। * जब कुछ मनोवैज्ञानिकों के कलाम से कुछ राहत मिल सकती है, * तो जिसने मनोवैज्ञानिक को पैदा किया है उसके कलाम का प्रभाव कितना व्यापक होगा। ** और जब हम ज़कात की ओर आते हैं, * जो कि इस्लाम का एक स्तंभ है, * तोवह आत्मा को कंजूसी और लालच से पाक करने, * दानशीलता की आदत डालने, * गरीबों और ज़रूरतंमदों की सहायता करने के लिए है * और एक अज्र व सवाब है जो अन्य इबादतों के समान क़ियामत के दिन लाभ देगा, * मानव द्वारा लगाये जाने वाले करों के समान कठोर और बोझ नहीं है, * यह एक हज़ार (1000) में केवल 25 है * जिसे एक सच्चा मुसलमान इच्छापूर्वक अदा करता है, वह उस से भागता नहीं है, यहाँ तक कि अगर कोई उसके पीछे लगने वाला न हो। ** जहाँ तक रोज़ा का संबंध है तो वह * अल्लाह की उपासना के स्वरूप , * खाने पीने की चीज़ों , * और संभोग से रूक जाना है, * औरइस में भूखे और वंचित लोगों की भावनाओं का एहसास होता है, * तथा सृष्टि पर सृष्टिकर्ता की नेमतों को याद दिलाना है * तथा इस में अनगिनत अज्र व सवाब (पुण्य) है। ** अल्लाह के पवित्र घर का हज्ज , (तीर्थ यात्रा) जो इब्राहीम अलैहिस्सलाम के द्वारा बनाया गया था, * यह अल्लाह के आदेश का अनुपालन, * दुआ की क़ुबूलियत और दुनिया भर के मुसलमानों से मिलने का शुभ अवसर है।
(03)एक दिन के रोज़े को दूसरे दिन के रोज़े से उनके बीच में इफ्तारी किए बिना मिलाने से रोका है, इसी तरह महिला को अपने पति की उपस्थिति में उसकी अनुमति के बिना नफ्ली रोज़ा रखने से रोका है।
* उनका ही धर्म सच्चा है ?
* क्या दुनियाँ के बाकी धर्म झूठे है?? ** कुछ इसी तरह के सवाल नॉन-मुस्लिम के मन में आते रहते हैं ! * और जो आदमी इस धर्म को व्यवहार में ला चुका है, इसके अंदर जो चीज़ें हैं उन पर उसका विश्वास और आस्था है , * और वह उस के अनुसार कार्य कर रहा है, तो उसे पूर्णतया उस नेमत की मात्रा का पता है जिस में वह जीवन यापन कर रहा है और वह इस धर्म की छत्र छाया में रह रहा है, वह इसका क्या जवाब दे ! तो आईये जाने कि इस सवाल का क्या जवाब है : 1. मुसलमानकेवल एक मा’बूद (पूज्य) की उपासना करता है , * जिसका कोई साझीदार नहीं, जिसके सुंदर नाम और उच्चतम गुण हैं। * चुनाँचि मुसलमान की दिशा और उसका उद्देश्य एक होता है, * वह अपने पालनहार और सृष्टिकर्ता पर विश्वास रखता और उसी पर भरोसा करता है, और उसी से मदद, सहायता और समर्थन मांगता है, * वह इस बात पर विश्वास रखता है कि उस का पालनहार हर चीज़ पर सक्षम और शक्तिवान है, * उसे बीवी और बच्चे की आवश्यकता नहीं है, * उसने आसमानों और धरती को पैदा किया, * वही मारने वाला, * जिलाने वाला, * पैदा करने वाला, * और रोज़ी देने वाला है। * अत: मुसलमान बन्दा उसी से रोज़ी मांगता है। * वह अल्लाह सुनने वाला क़बूल करने वाला है, * अत: बन्दा उसीको पुकारता , * (दुआ करता) और क़बूलियत की आशा रखता है। * वह अल्लाह तौबा स्वीकार करने वाला, क्षमा करने वाला दयावान् है, * अत: बन्दा जब पाप करता है, * और अपने रब की इबादत में कोताही करता है, * तो उसी के सामने तौबा करता है। * वह अल्लाह सर्वज्ञानी, * सब चीज़ों की सूचना रखने वाला, * और देखने वाला है, * जो कि दिल की इच्छाओं, भेदों और सीने की बातों को भी जानता है, * अत: बन्दा गुनाह के पास जाने से शर्म करता है और अपने नफ्स पर या किसी दूसरे पर ज़ुल्म नहीं करता है, * क्योंकि वह जानता है कि उसका पालनहार उस से अवगत है. * और उसे देख रहा है। * वह जानता है कि उस का * रब हकीम (तत्वदर्शी) है, * ग़ैब (प्रोक्ष) की बातों का जानने वाला है, * अत: जो कुछ अल्लाह ने उसके लिए चयन किया है, * और उस के बारे में मुक़द्दर किया है, * उस पर विश्वास और भरोसा करता है, * और इस बात को मानता है कि उसके रब ने उस पर ज़ुल्म नहीं किया है, * औरउस ने उसके लिए जो भी फैसला किया है वह उसके लिए बेहतर है, * अगरचे बन्दे को उसकी हिकमत (तत्वदर्शिता) का ज्ञान न हो।
2. मुसलमान की आत्मा पर इस्लामी उपासनाओं के प्रभाव :
* नमाज़ बन्दा और उसके पालनहार के बीच संपर्क का एक साधन है, * जब वह विनम्रता के साथनमाज़में प्रवेश करता है, * तो सुकून (शान्ति), इत्मेनान (संतुष्टि) और आराम का अनुभव करता है, * क्योंकि वह एक मज़बूत स्तंभ का शरण लेता है , * और वह अल्लाह अज्ज़ा व जल्ल है, इसीलिए इस्लाम के, * पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कहा करते थे : * हमें नमाज़ के द्वारा राहत पहुँचाओ, * और जब आप को कोई मामला पेश आता था तो आप नमाज़ की तरफ भागते थे। * हर वह आदमी जो किसी मुसीबत में पड़ गया और नमाज़ को आज़माया तो उसे जो मुसीबत पहुँची है उस से ढारस (सांत्वना) और धैर्य की सहायता का अनुभव हुआ है। * इस का कारण यह है कि वह नमाज़ में अपने रब के कलाम (वाणी) को पढ़ता है , * और रब के कलाम (वाणी) के प्रभाव की तुलना किसी मनुष्य के कलाम के प्रभाव से नहीं की जा सकती। * जब कुछ मनोवैज्ञानिकों के कलाम से कुछ राहत मिल सकती है, * तो जिसने मनोवैज्ञानिक को पैदा किया है उसके कलाम का प्रभाव कितना व्यापक होगा। ** और जब हम ज़कात की ओर आते हैं, * जो कि इस्लाम का एक स्तंभ है, * तोवह आत्मा को कंजूसी और लालच से पाक करने, * दानशीलता की आदत डालने, * गरीबों और ज़रूरतंमदों की सहायता करने के लिए है * और एक अज्र व सवाब है जो अन्य इबादतों के समान क़ियामत के दिन लाभ देगा, * मानव द्वारा लगाये जाने वाले करों के समान कठोर और बोझ नहीं है, * यह एक हज़ार (1000) में केवल 25 है * जिसे एक सच्चा मुसलमान इच्छापूर्वक अदा करता है, वह उस से भागता नहीं है, यहाँ तक कि अगर कोई उसके पीछे लगने वाला न हो। ** जहाँ तक रोज़ा का संबंध है तो वह * अल्लाह की उपासना के स्वरूप , * खाने पीने की चीज़ों , * और संभोग से रूक जाना है, * औरइस में भूखे और वंचित लोगों की भावनाओं का एहसास होता है, * तथा सृष्टि पर सृष्टिकर्ता की नेमतों को याद दिलाना है * तथा इस में अनगिनत अज्र व सवाब (पुण्य) है। ** अल्लाह के पवित्र घर का हज्ज , (तीर्थ यात्रा) जो इब्राहीम अलैहिस्सलाम के द्वारा बनाया गया था, * यह अल्लाह के आदेश का अनुपालन, * दुआ की क़ुबूलियत और दुनिया भर के मुसलमानों से मिलने का शुभ अवसर है।
(03)एक दिन के रोज़े को दूसरे दिन के रोज़े से उनके बीच में इफ्तारी किए बिना मिलाने से रोका है, इसी तरह महिला को अपने पति की उपस्थिति में उसकी अनुमति के बिना नफ्ली रोज़ा रखने से रोका है।
क़ब्रों पर निर्माण करने, या उसे ऊँची करने, उस पर बैठने, जूता-चप्पल पहन कर उनके बीच चलने फिरने,
* उस पर रौशनी करने, उस पर कोई चीज़ लिखने और उसे उखाड़ने से रोका है,
* इसी तरह क़ब्रों को मस्जिदें (पूजास्थल) बनाने से मना किया है।
* किसी आदमी के मर जाने पर नौहा करने (रोने-पीटने), कपड़ा फाड़ने, बाल खोलने से मना किया है, जाहिलियत के काल के लोगों की तरह मरने की सूचना देने से मना किया है, किन्तु किसी के मरने की मात्र सूचना देने में कोई हरज (आपत्ति) नहीं है।
सूद खाना निषिद्ध है,
हर वह क्रय-विक्रय जो अज्ञानता, धोखा-धड़ी पर आधारित हो वह निषिद्ध है,
* खून, शराब, सुअर और मूर्तियाँ बेचने से मना किया है,
* जिस चीज़ को भी अल्लाह तआला ने हराम घोषित किया है, उसकी क़ीमत भी हराम है चाहे उसे बेचा जाये या खरीदा जाये,
* इसी तरह नज्श से रोका गया है , -और वह यह है कि जो आदमी खरीदना नहीं चाहता है वह सामान की क़ीमत को बढ़ा दे जैसा कि बहुत सी नीलामी की बोलियों में होता है,
* इसी तरह किसी सामान को बेचते समय उसके ऐब को छिपाने से रोका है,
* इसी तरह आदमी जिस चीज़ का मालिक नहीं है उस को बेचना ,
* तथा किसी चीज़ को अपने क़ब्ज़े में करने से पहले बेच देना निषिद्ध है, * इसी तरह आदमी का अपने भाई के बेचने पर बेचना,
* अपने भाई की खरीद पर खरीद करना, और अपने भाई के भाव ताव पर भाव ताव करना निषिद्ध है।
* फलों को बेचने से रोका है यहाँ तक कि उसका पकना ज़ाहिर हो जाये और आफत ग्रस्त होने से सुरक्षित हो जाये,
* नाप और तौलमें कमी करने से,
* ज़खीरा करने से,
* तथा ज़मीन या खजूर के बाग इत्यादि में हिस्से दार को अपने शेयर को बेचने से मना किया है यहाँ तक कि उसे अपने साथी पर पेश कर दे,
* यतीमों के माल को जुल्म करके खाने से से रोका है,
* जुवा (लाटरी) का धन खाने से परहेज़ करने का हुक्म दिया है, लूट खसूट और जुवा से,
* रिश्वत(घूँस) लेने और देने,
* लोगों का माल छीनने, लोगों का माल अवैध रूप से खाने, इसी तरह उसे नष्ट कर देने के इरादे से लेने से मना किया है, लोगों की चीज़ों में कमी करने (हक़ मारने),
* गिरी पड़ी चीज़ को छिपाने और गायब कर देने, * गिरी पड़ी चीज़ को उठाने से रोका है सिवाय इसके कि वह उसकी पहचान (ऐलान) करवाये,
* हर प्रकार की धोखा-धड़ी, ऐसा क़र्ज़ लेने से जिसे चुकाने का इरादा न हो, इसी तरह अपने मुसलमान भाई का माल उसकी खुशी के बिना लेने से मना किया है,
* इसी तरह शर्म व हया के तलवार से लिया गया माल हराम है,
* तथासिफारिश के कारण उपहार स्वीकार करने से रोका है।
ब्रह्मचर्य और बधिया हो जाने से मना किया है,
* रिश्तेदारी के संबंधों को तोड़ने के डर से
* दो सगी बहनों को एक साथ शादी में रखने
* किसी औरत और उसकी फूफी को और * किसी औरत और उसकी खाला को एक साथ शादी में रखने से मना किया है,
* "शिगार" नामी (अर्थात् अदले बदले की) शादी से रोका है, - और वह इस प्रकार है कि उदाहरण के तौर पर आदमी कहे कि तुम मुझ से अपनी बेटी या बहन की शादी कर दो और मैं अपनी बेटी या बहन की शादी तुम से कर दूँगा, * इस प्रकार यह औरत दूसरी के बदले में हो, तो यह अन्याय और हराम है। *
* मुत्आ (अस्थायी शादी,लिव-इन-रिलेशनशिप) से रोका है, जो कि दो पक्षों के बीच पारस्परिक सहमति से एक निर्धारित अवधि तक के लिए होता है और अवधि समाप्त होने पर उस शादी का अंत हो जाता है।
* मासिक धर्म की अवधि में बीवी से संभोग करने से रोका है, बल्कि जब वह पवित्र हो जाये तो उस से सहवास करे,
* औरत के गुदा (पाखाने के रास्ते) में संभोग करना निषिद्ध है,
* अपने भाई के शादी के पैग़ाम (प्रस्ताव) पर शादी का पैग़ाम (प्रस्ताव) देना निषिद्ध है यहाँ तक कि वह उसे छोड़ दे या उसे अनुमति दे दे,
* पहले से शादीशुदा (जैसे बेवा या तलाक़शुदा) औरत की शादी उसकी सलाह व मश्वरा के बिना * और कुँवारी औरत की शादी उसकी अनुमति लिए बिना करना निषिद्ध है,
* नवविवाहित जोड़े को एक खुशहाल जीवन * और बेटे की बधाई देने से मना किया है, - क्योंकि यह जाहिलियत के समय के लोगों की शुभकामना है जो लड़कियों से नफरत करते थे,
* तलाक़शुदा औरत को अपने गर्भ को छुपाने से रोका है,
* पति और पत्नी के बीच संभोग से संबंधित जो बातें होती हैं उन्हें दूसरों से बयान करने से रोका गया है,
* बीवी को उसके पति के खिलाफ भड़काने और तलाक़ से खिलवाड़ करने से रोका है,
* किसी औरत के लिए निषिद्ध है कि वह अपने बहन के तलाक़ का मुतालबा करे चाहे वह (पहले से उसकी) बीवी हो या शादी के लिए प्रस्तावित हो, - उदाहरण के तौर पर एक औरत किसी मर्द से यह मांग करे कि वह अपनी बीवी को तलाक़ दे दे ताकि यह औरत उस से शादी कर ले, * औरत को बिना इजाज़त अपने पति के धन से खर्च करने से मना किया है, * औरत को अपने पति के बिस्तर को छोड़ने से रोका है, * और यदि बिना किसी शरई कारण के ऐसा करती है तो फरिश्ते उस पर लानत भेजते हैं,
* आदमी को अपने बाप की बीवी से शादी करने से रोका है,
* आदमी को ऐसी औरत से संभोग करने से रोका है जो किसी दूसरे आदमी से गर्भवती हो,
* आदमी को अपनी आज़ाद बीवी से उसकी अनुमति के बिना अज़्ल करने से रोका गया है , * आदमी को यात्रा से लौटते समय अचानक रात के समय अपनी पत्नी के पास आ धमकने से रोका है, हाँ अगर अपने आने के समय की पूर्व सूचना दे दे तो कोई बात नहीं, * पति को अपनी पत्नी के मह्र को उसकी सहमति के बिना लेने से रोका है, * तथा पत्नी को इस उद्देश्य से परेशान करने और हानि पहुँचाने से रोका है ताकि वह परेशान हो कर अपना धन देकर उस से छुटकारा हासिल करे। (03)
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