अलविदा के वक्त "खुदा हाफ़िज़" कहने के बारे में।
जब हम किसी को अलविदा करते हैं या उससे जुदा होते हैं तब बार-बार एक वाक्य सुनने को मिलता है और वो है "खुदा हाफ़िज़"।
❇️ सबसे पहले यह बात समझ लेनी चाहिए कि रसुलुल्लाह ﷺ जब किसी को अलविदा करते थे तब उनका अमल क्या था...? अलविदा के वक्त क्या कहना सुन्नत लिखा जाएगा...?
एक हदीष में रसुलुल्लाह ﷺ का इरशाद है कि...
إذا أتیتم المجلس فسلموا علی القوم، وإذا رجعتم فسلموا علیہم؛ فإن التسلیم عند الرجوع أفضل من التسلیم الأول۔ (رواہ مسلم، رقم الحدیث: ۱۶۸۲، ۲۱۳۲)
तर्जुमा:- जब आप किसी मजलिस (सभा) में आए तो वहां लोगों को सलाम करो। और जब वहां से रवाना हो तब भी सलाम करो। क्योंकि पहली बार (मजलिस में आते वक्त) सलाम करने की तुलना में रवाना होते वक्त में सलाम करना श्रेष्ठ और उत्तम है।
ऐसे ही एक दूसरी हदीष में आता है कि जब कोई रुखसत होता तो रसुलुल्लाह ﷺ उसे निम्नलिखित दुआ देते थे।
عَنْ سَالِمٍ، أَنَّ ابْنَ عُمَرَ، كَانَ يَقُولُ لِلرَّجُلِ إِذَا أَرَادَ سَفَرًا: ادْنُ مِنِّي أُوَدِّعْكَ كَمَا كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُوَدِّعُنَا، فَيَقُولُ :
" أَسْتَوْدِعُ اللَّهَ دِينَكَ وَأَمَانَتَكَ وَخَوَاتِيمَ عَمَلِكَ "۔
( ترمذى : رقم الحديث / ٣٤٤٣ )
"में आपके दीन , आपकी अमानत और आपके आखिरी अमल (हुस्ने खातिमह्) को अल्लाह के हवाले करता हूं।"
इसलिए किसी व्यक्ति को अलविदा करते वक्त सलाम और उपरोक्त दुआ देने की आदत बनानी चाहिए। क्यूंकि अलविदा के वक्त सलाम करना और उपरोक्त दुआ देना रसुलुल्लाह ﷺ की सुन्नत है।
"खुदा हाफ़िज़" वाक्य चाहें एक दुआ ही है लेकिन जब रसुलुल्लाह ﷺ से अलविदा के वक्त एक निश्चित अमल साबित होने के बाद भी एक दुसरी दुआ की आदत बना लेना सही नहीं है।
इसलिए उलमा ने लिखा है कि साबित और सुन्नत अमल को छोड़कर सिर्फ "खुदा हाफ़िज़" की आदत बना लेनी मकरुह और सुन्नत के खिलाफ अमल है। हां सुन्नत अमल के साथ-साथ "खुदा हाफ़िज़" भी कहा जाए तो कोई हर्ज नहीं है।
Comments