तरीक़ा-ए-इंक़लाब
बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम (بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ) अथार्त शुरु करता हूँ अल्लाह के नाम से दयालु और कृपाशील है.
आज का मेरा मौज़ू है–मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसलम का तरीक़ा-ए-इंक़लाब | इस पर बात करने से पहले मैं आपको बता देना चाहूंगा कि इंक़लाब है क्या |
इंक़लाब का अर्थ : अगरचे इंक़लाब का लफ्ज़ी मानी है–तब्दीली, और ये किसी भी क़िस्म की तब्दीली के साथ जुड़ जाता है जैसे कि इल्मी इंक़लाब, फ़ौज़ी इंक़लाब इत्यादि | इसी प्रकार तारीख़-ए-इंसानी में एक तब्दीली ऐसी आई थी जिसकी कोई मिसाल है नहीं और वो तब्दीली तब आई एक पूरी सल्तनत ने अपना मज़हब तब्दील कर लिया जब कॉन्सेन्टाइन ईसाई हो गया | इतनी बड़ी तब्दीली तारीख़-ए-इंसानी की लेकिन इसे इंक़लाब नहीं कहा गया | यानी मज़हबी तब्दीली या अक़ीदे की तब्दीली को इंक़लाब नहीं कहा गया |
इंक़लाब क्या है : इंक़लाब वो है जब किसी एक निज़ाम (सियासी निज़ाम या आर्थिक निज़ाम या सामाजिक निज़ाम) में मुक़म्मल तब्दीली आए | जैसे सियासी निज़ाम का बदलना मानी मुलुकीयत ख़त्म हो जाए और जम्हूरियत आ जाए | या बरहमन का सामाजिक निज़ाम का बदलना मानी वर्णव्यवस्था की जगह और उसकी जगह बिन ऊंच-नीच और भेदभाव का निज़ाम आए | या आर्थिक निज़ाम का बदलना जैसे सरमायदारी ख़त्म हो जाए और साम्यवाद आ जाए |
इन तीनों या तीनों में से किसी एक निज़ाम में बुनियादी तब्दीली होगी तो उसे इंक़लाब कहेंगे |
इंसानी तारीख़ में मुक़म्मल इंक़लाब अगर किसी ने बरपा किया तो है वो वाहिद शख़्सियत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसलम की है | आप के आने से सियासी ढांचा बदल गया, आर्थिक ढांचा बदल गया, समाजिक ढांचा बदल गया और वो भी बदल गया जो इंक़लाब में नहीं आता जैसे कि अक़ाईद बदल गए रहन सहन बदल गया |मानी तारीख़-ए-इंसानी में मुक़म्मल इंक़लाब (total revolution) आप मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसलम के दस्त-ए-मुबारक़ से आया |
आज मैं इख़्तिसार से आप के सामने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसलम का तरीक़ा-ए-इंक़लाब पेश करूंगा जिसकी तफ़्सीर आप को किताबों में पढ़नी होगी |
तरीक़ा-ए-इंक़लाब के पांच मरहलें और हर एक मरहला दूसरे मरहले के ऊपर है | आप ये नहीं कर सकते कि किसी एक मरहले को छोड़कर दूसरे मरहले पर चले जाएं | तसव्वुर कीजिए कि कोई पांच मंजिला इमारत है और आप को पांचवी मंजिल पर जाना है क्योंकि आपकी मंज़िल ही पांच मंज़िला इमारत तक पहुंचना है | यह तो नहीं कि आप पहली से सीधे पांचवी मंजिल तक पहुंच जाओगे ‘नहीं | आप पहली मंज़िल से शुरुआत करोगे और पहली के बाद दूसरी मंज़िल, दूसरी के बाद तीसरी मंज़िल, तीसरी के बाद चौथी मंज़िल और चौथी मंज़िल के बाद ही पांचवी मंज़िल तक जा पाओगे | और अगर आप दूसरी या तीसरी या चौथी मंज़िल तक आ भी जाओ और पांचवी मंज़िल तक पहुंचने का जज़्बा खो बैठो तो शुरुआत से शुरू करे फिर |
ऐसे ही तरीका-ए-इंक़लाब के पांच मरहलें है जिसमें आप को हर मरहले को पार करते हुए पांचवें तक पहुंचना है यह नहीं कि आप दूसरे या तीसरे या चौथे तक आकर पांचवे तक आने का जज़्बा खो बैठो | जिन्हें आप को बारी-बारी से पार करना है और वो पांच मरहले दर्ज़-ए-ज़ैल है–
(1) पहला मरहला : दावत-ए-ईमान ब'ज़रिया क़ुरआन क़ुरआन पढ़के सुनाओ | क़ुरआन पढ़के सुनाओ. क़ुरआन पढ़के सुनाओ | इस क़ुरआन के ज़रिए से दिलों में ईमान पैदा होगा | यक़ीन वाला ईमान | देखिए बुरा न माने मुग़ालते में न रहिए मेरे और आपके दिलों में ईमान नहीं है अक़ीदा है | अक़ीदा है वालिदैन से मिला है | यक़ीन वाला ईमान कहां है! अपने गिरेबां में झांकिए “अल्लाह” आप को तौफ़ीक़ दे | क्या मुझे वाक़ई यक़ीं है मरने के बाद जी उठना है? क्या मुझे वाक़ई ये यक़ीं है आख़िरत की ज़िंदगी असल ज़िंदगी है? क्या मुझे वाक़ई यक़ीं है कि क़ुरआन अल्लाह का कलाम है? टटोलिए अपने दिलों को?
अगर यक़ीं होता कि अल्लाह का कलाम है तो उस को समझने के लिए आप अरबी भी नहीं सीख सकते?
अंग्रेजी आप पढ़ें और पढ़ी आप ने ऐसी कि अंग्रेजों को पढ़ा दें, क्या नहीं किया! आप ने पी.एच्.डी'ज़ की, आप ने क्या क्या नहीं सीखा? डॉक्टरी | इतनी अरबी नहीं सीखी | तुम्हारा दांवा है तुम्हारा यक़ीं था मेरी किताब पर? अल्लाह पूछेगा तुम्हारा क्या सलूक था मेरी किताब के साथ? तूने पढ़ा उसको? तूने समझा उसे? उसे समझने के लिए अरबी सीखी? नहीं |
तो तुम झूट बोल रहे हो | तुम्हारा कोई ईमान नहीं था मेरी किताब पर | जिन्होंने सूद को ‘अपने पूरे निज़ाम की जड़ बनाया हुआ हो उन का ईमान है कोई अल्लाह पर | हुज़ूर (स.अ.व.) फ़रमाते है कि जिस शख़्स ने हराम की किसी शय को अपने लिए हलाल कर लिया उस का कोई ईमान नहीं | दोबारा आज भी करना है तो दोबारा ईमान पैदा करना होगा ईमान ‘अक़ीदा नहीं ईमान |
(2) दूसरा मरहला : तज़किया
तज़किया का लफ्ज़ी मानी है–मांझना | पहले मरहले से जो लोग आए फिर उनका तज़किया किया | अंदर का बातिन धो दिया क़ुरआन ने | क़ुरआन जब किसी के अंदर उतरता है तो उसके अंदर की मुक़म्मल सफाई कर देता है–दिमाग़ की सफ़ाई गलत नज़रियात से और दिल की सफ़ाई गलत नीयतों से, गलत इरादों से |
मानी ये जानें कि दूसरे मरहले में एक फ़िक़्र पैदा होती है और क़ल्ब-ओ-ज़ेहन-ओ-रूह-ओ-नफ़्स का तज़किया होता है |
3) तीसरा मरहला : बैयत
बैयत (بیعت) के लफ़्ज़ी मानी हैं–बेच देना | जब हम किसी से बैयत करते है तो इसका मतलब यह है कि हम किसी से अहद कर रहे है उसके हुक़्म की पाबंदी के लिए |
इस्लाम में बैयत का मतलब यह है कि अपनी जान-ओ-माल को अल्लाह के हवाले के कर देना | जैसा कि क़ुरआन में है कि अल्लाह ने मोमिनों की जान-ओ-माल को जन्नत के बदले ख़रीद लिया है |
तीसरे मरहले में उन्हें जमा करो ताक़त बनाओ बैयत के ज़रिए से | जो सोचते है कि बैयत वैयत तो पुराने ज़माने की बातें है ‘नहीं, मैं समझता हूं कि बैयत ज़रूरी है |
बैयत क्या है इसकी तफ़्सीर किताब ही में पढ़ें हालांकि मैं ऊपर उतना बयां कर चुका हूं जितना आपके लिए फ़िलहाल काफ़ी है |
जैसा कि मैं ने कहा कि इस्लाम में बैयत का मतलब यह है कि अपनी जान-ओ-माल को अल्लाह के हवाले के कर देना तो इस के लिए हम जिस किसी शख़्स की बैयत करेंगे उसके तीन हिस्से होंगे जो दर्ज़-ए-ज़ैल हैं–
•वैसे तो हम पहले मरहले ही में ईमान ला चुके होते है और अपने गुनाह से तौबा भी करते रहते है लेकिन बैयत के वक़्त भी पहले हिस्से में कलमा-ए-शहादत-ओ-इस्तग़फ़ार को क़ल्ब ओ ज़ेहन में ताज़ा करेंगे और ज़बान से भी दोहराएंगे–
“अश-हदु अल्लाह इल्लाह इल्लल्लाहु वह दहु ला शरी-क लहू व अशदुहु अन्न मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुहु | ”
फिर इस्तग़फ़ार/तौबा भी करें. ऐ अल्लाह अब तक जो ख़ता हुई बख़्स दे आइंदा के लिए तौबा करता हूं | (तफ़्सीर किताब में पढ़ें | )
•बैयत के दूसरे मरहले में हम अल्लाह से अहद करते है कि हर उस चीज़ को छोड़ दूंगा जो उसे (अल्लाह) को नापसंद है और उसकी राह में जिहाद करूंगा अपनी जान-ओ-माल के साथ यानी कि मैं अपना माल भी ख़र्च करूंगा और अपनी जान भी खपाउंगा उसके दीन को क़ायम करने के लिए और कालिमे को बुलंद करने के लिए | (तफ़्सीर किताब में पढ़ें | )
•बैयत के तीसरे मरहले में हम दूसरे मरहले की जद्दोजहद के लिए यानी दीन को क़ायम करने के लिए उस से अहद करते है जिसकी बैयत कर रहे होते है जिसमें यह है कि मैं अहद करता हूं–
“आप का हर हुक़्म सुनूंगा और मानूंगा बशर्ते कि शरीयत के ख़िलाफ़ न हो लेकिन शरीयत के दायरे में है तो चाहे मुश्किल हो चाहे आसान, चाहे तबीयत आमादा हो चाहे तबीयत पर जब्र करना पड़े, चाहे मुझ पर दूसरों को तरज़ीह दे दी जाए, जिन को आप जिम्मेदार बना देंगे अमीर बना देंगे मकामी हलके का ‘उन से झगडूंगा नहीं उनकी इताअत करूंगा लेकिन जो भी हक़ बात होगी होगी जहां भी होऊंगा कहूंगा ‘किसी मलामत करने वाले की मलामत के खौफ़ से अपनी ज़बां बंद नहीं करूंगा |”
(तफ़्सीर किताब में पढ़ें | )
(4) चौथा मरहला : सब्र तब तक जब तक ताक़त काफ़ी न हो
चौथे मरहला क्या है–जब तक ताक़त काफ़ी न हो तुम्हें सताए तो मार खाओ जवाबी कार्यवाही कोई न करना | अभी तुम्हारी तादाद बहुत कम है | अगर तुम आक्रमक हो जाओगे तो ख़त्म कर दिए जाओगे, कुचल दिए जाओगे | चाहे वो तुम्हारे टुकड़े कर दे कोई जवाबी कार्यवाही नहीं |
हज़रत ख़ब्बाब बिन अरत रज़ि० का वाक़या आप तमाम ने सुना ही होगा | हज़रत ख़ब्बाब को बुलाया गया | आओ ख़ब्बाब ‘आ गए | उनकी निगाहों के सामने दहकते हुए अंगारे ज़मीन पर बिछाए गए | उतारो कुर्ता ‘उतार दिया | लेट जाओ इन पर ‘लेट गए | खाल जली चर्बी पिघली अंगारे ठंडे हुए |
अब ऐसा शख़्स सोचिए…अगर उसे इज़ाज़त हो तो दो चार को मार के मरेगा ना ‘जिंदा कबाब बनाने चले है ये मुझे | डेस्पेरेट इंसान दो चार को मारकर मरता है | इज़ाज़त नहीं है. हुक़्म था हाथ रोके रको |
चौथे मरहले में जब तक ताक़त काफ़ी न हो आक्रमक नहीं होना, जवाबी कार्यवाही नहीं करनी |
(5) पांचवा मरहला : क़िताल
अलबत्ता जब तैयार हो गए | तादाद क़ाफ़ी हो गई | तज़किया हो चुका है | दिल में कोई आरज़ू नहीं है सिवाय अल्लाह की रज़ा और आख़िरत की फ़लाह के |
शहादत है मतलूब-ओ-मक़्सूद-ए-मोमिन
न माल-ए-ग़नीमत न किश्वर-कुशाई
अब आख़िरी मरहला शुरू –क़िताल (जंग).
बा नशा दरवेशी दर सज़म वा दमादम ज़न
12 साल मक्का में दरवेशी, दावत, नसीहत, तब्लीग़, वाज़ | कोई पागल कह गया ठीक है सुन लिया | किसी ने अपमान किया बदले में दुआएं दी | किसी ने पत्थर मारे सहन किया | ये सब दरवेशी | दरवेशी | दरवेशी |
मदीने में आने के बाद सिर्फ़ 6 महीने आप मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसलम ने लिए और 3 काम किए; मस्जिद-ए-नबवी की तामीर, मुहाजिर और अंसार भाई-भाई ‘मुलाकात, और तीसरा काम यहूदियों के तीन कबीले थे ‘को जकड़ लिया एक मुआहिदे के अंदर |
इस के बाद आप ने छापे मारे दस्ते भेजने शुरू कर दिए | जंग हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसलम ने शुरू की है कुरैशी ने नहीं की |
हम मग़रिबी प्रोपगंडे की वज़ह से कहते रहते है कि नहीं नहीं हम ने तो दिफ़ाई जंग लड़ी थी ‘दिफ़ाई जंग नहीं थी | हुज़ूर का तो फ़र्ज़ था दीन को नाफ़िज़ करना दीन को क़ायम करना ‘वो बातिल निज़ाम के सरदार तो बैठे हुए थे मक्का के अंदर |
बहरहाल उसके बाद जंग शुरू हुई है | जंग में उतार चढ़ाव भी हुए लेकिन आख़िरी फ़तह दीन ही की हुई | बदर में बहुत बड़ी फ़तह हुई तो ओहद में थोड़ी सी डिसिप्लीन की कमज़ोरी हो गई तो अल्लाह ने सज़ा दी माफ़ नहीं किया हालांकि फ़तह हो गई थी | डिसिप्लीन की कमी थी कि 50 तीरंदाज़ जहां खड़े किए थे हुज़ूर ने ‘कहा था यहां से ज़रा ना हिलना, चाहे तुम देखो कि यहां हम सब क़त्ल हो गए और परिंदे हमारा गोश्त नोच नोचकर खा रहे है भी यहां से न हिलना | वहां डिफरेंस ऑफ ओपनियन ये हुआ कि ये तो हुज़ूर ने शिकस्त की शक्ल में कहा था लेकिन ये तो फ़तह हो गई | लोकल कमांडर कहते रहे कि मत हिलो लेकिन 50 में से 35 चले गए 15 रह गए | ख़ालिद बिन वलीद की उकाबी आंख ने देख लिया कि वो मोर्चा खाली है | शिकस्त हो चुकी थी लेकिन वापस आकर पीछे से हमला किया, 70 सहाबा शहीद हुए |
इसलिए हुक़्म मानो अपने अमीर का और डिसिप्लीन में रहो | जो मैं कहा करता हूं कि गलती की सज़ा नहीं होती गलती ख़ुद में सज़ा होती है | तो वो सज़ा देख लें आप कि 70 सहाबा शहीद हुए थे |
अल्लाह अपने नबी और उनके साथियों की ख़ूब आज़माइश लेता है | एक दम नुसरत (ख़ुदाई मदद) नहीं आती |
ये रास्ता इख़्तियार करना होगा अगर तो हुज़ूर के परवानों में नाम लिखवाना है | परवाने का काम तो जल जाना है ना शमा के लिए इस लिए ये पांचों मरहलें ज़ेहन में रखें–
»दावत ए ईमान ब ज़रिया क़ुरआन;
»तज़किया ब ज़रिया क़ुरआन;
»तंज़ीम ब ज़रिया ए बैयत;
»सब्र : सब्र तक तक जब तक ताक़त काफ़ी न हो और
»टकरा जाओ जब ताक़त काफ़ी हो जाए.
हिंदी मुसलमान जो भटक रहे है ये बदनियत नहीं है रास्ता मालूम नहीं है | अभी हमारे सामने है कि मुसलमान अपनी जान हथेली पर रखकर मैदान में आ गए अब उनके ख़ुलूस में क्या कमी है भला लेकिन रास्ता मालूम होना बहुत ज़रूरी है | हिंदी मुसलमां को कोई रास्ता दिखाने वाला नहीं है |
निशान-ए-राह दिखाते थे जो सितारों को
तरस गए हैं किसी मर्द-ए-राह-दां के लिए
[नोट : इस लेख का अज़ीमतर हिस्सा इसरार अहमद रहमतुल्लाह अलैहि की तक़रीरों पर मबनी है | मैं ने अपना फ़र्ज़ पूरा किया अब आप का फ़र्ज़ है कि तरीक़ा-ए-इंक़लाब-ए-रसूल स.अ.व. को आगे तक पहुंचाए | ]
Muhammad Sajid Ali Osman

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